कुछ पुरातन पंथी लोग स्त्रियों की शिक्षा के विरोधी थे। द्विवेदी जी ने क्या-क्या तर्क देकर स्त्री-शिक्षा का समर्थन किया?


लेखक महावीर प्रसाद द्विवेदी का हिन्दी साहित्य के उत्तम गद्यकारों में स्थान माना जाता है। उनकी प्रस्तुत रचना में कुछ पुरातनपंथी लोगों द्वारा स्त्री शिक्षा के विरोधी रहने की बात पर लेखक द्वारा चिंता प्रकट की गई है। वास्तव में हम स्त्री शिक्षा के विरोध की प्रवृत्ति को काफी लंबे समय से हमारे समाज में चलती आई एक सामाजिक कुरीति मान सकते हैं। ऐसी प्रवृत्ति द्विवेदी युग में भी थी। हमारे समाज में ऐसी सोच का जन्म संभवतः उत्तर वैदिक काल के दौरान हुआ। इससे पूर्व ऋग्वैदिक काल में समाज में लोग स्त्री शिक्षा का समर्थन करते थे। जिसका उदाहरण हम उस समय की पढ़ी-लिखी महिलाओं जैसे गार्गी, मैत्रेयी, लोपामुद्रा जैसी विदुषियों के माध्यम से देख सकते हैं|

द्विवेदी जी ने इस प्रकार कहते हुए स्त्री शिक्षा का समर्थन किया है कि जब पुराने समय में स्त्रियाँ अधिक नहीं तो कम से कम थोड़ा तो शिक्षित थीं ही। उनका इस प्रकार मानना है कि सभी स्त्रियाँ भले ही उपरोक्त महिलाओं की तरह विद्वान न रही हों और अधिकतर महिलाएं केवल प्राकृत भाषा ही जानती हों। इसका अर्थ यह नहीं है कि वे सभी महिलाएं अनपढ थीं। पुरूषों में भी सभी संस्कृत भाषा जानने वाले नहीं थे। यही हाल महिलाओं का भी रहा होगा और हो न हो काफी संख्या में स्त्रियाँ अवश्य ही प्राकृत भाषा में दक्ष रही होंगी। इस प्रकार वे अनपढ़ तो थीं ही नहीं। द्विवेदी जी फिर महिलाओं की शिक्षा आज के समय की जरुरत मानते हैं।


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