अपने विद्यालय में हुई संगीत समारोह पर टिप्पणी करते हुए माँ को पत्र लिखिए-

अथवा


विद्यालयों में योग-शिक्षा का महत्व बताते हुए किसी समाचार-पत्र के संपादक को पत्र लिखिए।


शिव निवास


प्रतापनगर, जयपुर


दिनांक: 19 मई 2019


प्रिय माँ,


आपका पत्र मिला| यहाँ सब कुशल मंगल है | यह पत्र मैंने आपको मेरे विद्यालय में हुई संगीत समारोह के बारे में बताने के लिए लिखा है |


हमारे स्कूल में आज संगीत प्रतियोगिता रखी गयी थी | इसकी तैयारी काफी दिनों से चल रही थी| स्कूल को बहुत अच्छे से सजाया गया था ताकि ठीक तरीके से संगीत समारोह का आयोजन हो सके| एक-एक कर सभी बच्चों ने अपनी प्रस्तुति दी और मैंने में अपनी प्रस्तुति दी| संगीत समारोह में बच्चों को मोटीवेट करने के लिए बाहर से कुछ प्रसिद्द संगीतकारों को प्रस्तुति देने के लिए बुलाया गया था| उन्होंने भी अपनी प्रस्तुति दी|


इसके अलावा कई बच्चो ने नृत्य और नाटक पेश किया| अंत में इस समारोह में बेहतरीन प्रस्तुति देने वाले बच्चों को पुरुष्कृत किया गया|


माँ आपने मुझे विद्यालय भेजने के लिए जो भी प्रयास किये और मुझे पढ़ाई के लिए प्रेरित किया उसके लिए शुक्रिया| माँ आपके सामने अपनी थोडा कठिन है लेकिन मैं कहना चाहती हूँ कि आप मेरी जिंदगी में बहुत मायने रखती हैं|


आपकी बहुत याद आती है| आप अगर थोडा वक्त निकालकर मुझसे मिलने आएंगी तो मुझे बहुत ख़ुशी मिलेगी| आपके उत्तर कि प्रतीक्षा रहेगी अपना ख्याल रखियेगा |


आपकी पुत्री


प्रिया


अथवा


सेवा में,


संपादक महोदय,


दैनिक जागरण,


सेक्टर 22 नॉएडा(उत्तर प्रदेश)


दिनांक-5 फरवरी 2019


विषय: विद्यालयों में योग-शिक्षा का महत्व बताने हेतु पत्र।


महोदय,


मैं आपके लोकप्रिय समाचार पत्र के माध्यम से विद्यालयों में योग-शिक्षा के महत्त्व के बारे में लोगों को जागरूक करना चाहती हूँ| आशा है कि आप मेरे पत्र को अपने लोकप्रिय समाचार पत्र में प्रकाशित करेंगे।


योग एक ऐसी क्रिया है जिसके माध्यम से हम अपने शरीर के साथ-साथ मन को संयत कर सकते हैं| योग के माध्यम से हमारा शरीर स्वस्थ और मन शान्त रहता है साथ ही योग के माध्यम से हम अपने तन और मन को नियंत्रित करना भी सीख सकते हैं| इसे किसी धार्मिक सिद्धांत का प्रचार नहीं करना है। संसार के सभी धर्म वालों को इसके द्वारा यह शिक्षा मिलती है कि किस प्रकार अपनी-अपनी धर्मविषयक बातों में मन को एकाग्र करने से शांति और आनंद प्राप्त होता है।


'स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन रहता है', यह सिद्धांत सर्वमान्य है। योग शिक्षा में आहार-विहार के नियमों का पालन अत्यंत आवश्यक है। श्रीमद् भगवद्गीता में स्पष्ट ही कहा है कि जो 'युक्ताहारविहार' नहीं हैं, उन्हें जीवन में कोई सफलता नहीं मिल सकती।


मेरा सरकार से अनुरोध है कि वे राष्ट्रीय स्तर पर स्कूली एवं विश्विद्यालायी शिक्षा के पाठ्यक्रम में योग शिक्षा को आवश्यक रूप से शामिल करें|


धन्यवाद!


भवदीया


मोहन


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