कंचे जब जार से निकलकर अप्पू के मन की कल्पना में समा जाते हैं, तब क्या होता है?
एक दिन अप्पू को स्कूल जाते समय पास ही के एक दुकान में कंचों का जा़र दिखाई देता है। कंचे देखते ही अप्पू उस दुकान पर चला गया। दुकान पर दुकानदार नहीं था। अप्पू को कंचे बहुत पसंद थे। कंचों का जा़र उसके देखते-देखते बड़ा होने लगा था। कंचे जब जार से निकलकर अप्पू के मन की कल्पना में समा जाते हैं और जार बड़ा होते होते असमान जितना बड़ा हो जाता है| उस बड़े जा़र में केवल अप्पू और कंचे थे। वह मज़े से अपनी कल्पना में कंचों को बिखेर-बिखेर कर खेल रहा था। अचानक उसे एक तेज़ आवाज सुनाई पड़ती है और उस आवाज के उसके कानों में पड़ने से अप्पू की कल्पना टूट जाती है|
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