‘स्त्रियों को पढ़ाने से अनर्थ होते हैं’- कुतर्कवादियों की इस दलील का खंडन द्विवेदी जी ने कैसे किया है, अपने शब्दों में लिखिए।
‘स्त्रियों को पढ़ाने से अनर्थ होते हैं’- कुतर्कवादियों के ऐसे कुतर्क को लेखक अपने व्यंग्यवाण से छलनी कर देते हैं। लेखक का मानना है कि अनर्थ करने के लिए मनुष्य का पुरूष या स्त्री होना कोई खास मायने नहीं रखता और इसका इनकी पढाई-लिखाई से भी कोई खास रिश्ता नहीं है। किसी कार्य की संपूर्णता हेतु उस कार्य में कुशलता की कामना की जाती है। यह कुशलता पुरूष में भी हो सकती है और स्त्री भी उस कार्य या किसी आयोजन को सफलतापूर्वक समपन्न कर सकती है फिर चाहे वह कोई धार्मिक आयोजन हो, सामाजिक कल्याण का कार्य हो अथवा कोई अन्य कार्य हो| सभी मामलों में स्त्रियों को पुरुषों के बराबर न समझना वास्तव में समाज के प्रति एक प्रकार का अपराध है। आगे वे स्त्रियों की साक्षरता के इतिहास के बारे में समाज के आकलन को दोषपूर्ण मानते हैं। वे प्राचीन भारत में स्त्रियों के निरक्षर रहने को तथ्य से परे मानते हैं और प्राचीन भारत में हुईं कई विदूषी महिलाओं के नाम गिनाते हैं। वे हमें दुष्यंत-शकुंतला के प्रकरण का स्मरण कराते हैं कि किस प्रकार दुष्यंत एक ऋषि से मिले श्राप के कारण शकुंतला को विवाहोपरांत भूल जाते हैं तथा शकुंतला उन्हें भला-बुरा कह डालती हैं। लेखक इस अनर्थ में शकुंतला की शिक्षा अथवा उनके स्त्री होने से कोई संबंध नहीं है बल्कि यह तो स्वाभाविकता का परिणाम है| इसका उनके महिला होने से भी कोई संबंध नहीं है| उसी प्रकार लेखक राम-सीता प्रकरण में सीता की अग्नि परीक्षा के बारे में राम के शिक्षित होने से सीता को कोई विशेष लाभ हुआ नहीं मानते हैं। इस प्रकार लेखक स्त्रियों की शिक्षा से समाज में कोई अनर्थ होता हुआ नहीं पाते हैं। और इस प्रकार लेखक स्त्रियों के संबंध में कुतर्कवादियों की इस दलील की स्त्रियों की शिक्षा से अनर्थ होता है का खंडन सफलतापूर्वक करते हैं|
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