लेखक अपने छात्र जीवन में स्कूल से छुट्टियों में मिले काम को पूरा करने के लिए क्या-क्या योजनाएँ बनाया करता था और उसे पूरा न कर पाने की स्थिति में किसकी भांति ‘बहादुर’ बनने की कल्पना करता था?
छुट्टियों के समय लेखक को स्कूल से जो काम मिलता था उसके लिए वो एक समय सारणी तैयार करते थे। लेकिन छुट्टियां शुरू होते ही लेखक का सारा समय तालाब में नहाने और दोस्तों के साथ खेल कूद में निकल जाता फिर जैसे-जैसे छुट्टियां बीतने लगती उनका डर बढ़ने लगता। वे अपनी सभी मस्ती भूलकर मास्टरजी द्वारा दिए गए काम का हिसाब लगाने लगते। जैसे मास्टर जी दो सौ से कम सवाल कभी ना बताते। लेखक मन में हिसाब बैठाता कि अगर दस सवाल रोज निकाले जाएँ तो बीस दिन में काम पूरा हो जाएगा। जब ये मन बनता तो फिर खेल कूद शुरू हो जाता और दस दिन यूं ही निकल जाते। इसके बाद एक दिन में पंद्रह सवाल करने का हिसाब बनने लगता लेकिन जब यह हिसाब बनता तो दिन छोटे होने लगते और पिटाई का डर बढ़ने लगता। वहीं लेखक के ऐसे बहुत से साथी थे जो काम पूरा करने की जगह मास्टर की पिटाई खाना ज्यादा सस्ता सौदा समझते थे। हालांकि लेखक पिटाई से बहुत डरते थे लेकिन फिर वो भी उन बहादुरों की तरह की सोचने लगते और उस समय उनका बड़ा नेता ‘ओम’ हुआ करता जिसकी भांति वह बहादुर बनने का सोचने लगते।
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