आज की उपभोक्तावादी संस्कृति हमारे दैनिक जीवन को किस प्रकार प्रभावित कर रही है?
दुनिया में संसाधन बहुत सीमित मात्रा में हैं, जनसँख्या तेजी से बढ़ रही है और साथ ही आज लोग जाने—अनजाने ये मान बैठे हैं कि उपभोग—भोग ही सुख है| इन्हीं सब कारणों के फलस्वरूप मानव प्राकृतिक एवं मानव निर्मित संसाधानों का बिना किसी रोक-टोक उपयोग करता जा रहा है| उसने उत्पादों के लिए खुद को समर्पित कर दिया है। इस सूक्ष्म बदलाव से मानव जीवन को बहुत नुकसान हो रहा है जो निम्नलिखित हैं—
(1) आज हम अपने खाने-पीने और पहनने के लिए उन सभी वस्तुओं का प्रयोग कर रहें हैं, जिनका विज्ञापन हर दिन टीवी पर देखते हैं। साथ ही उसी में अपना सुख देखने लगे हैं। हम बिना कुछ सोचे की इसे प्रयोग करेंगे अथवा नहीं हर वस्तु को खरीद लेते हैं|
(2) हम पश्चिमी सभ्यता का अंधानुकरण कर रहे हैं। इससे जीवन से शांति गायब हो रही है और आक्रोश बढ़ रहा है।
(3) उपभोक्तावादी संस्कृति से समाज में दिखावा बढ़ गया है। लोग महंगी चीजें जरूरत के लिए नहीं बल्कि दिखावे के लिए खरीदते हैं।
(4) समाजिक सरोकार कम होते जा रहें हैं। नैतिक मापदंड तथा मर्यादाएँ कमज़ोर पड़ती जा रही हैं।
(6) स्वार्थ की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिल रहा है।
(7) हम आधुनिकता के झूठे प्रतिमान अपनाते जा रहे हैं। प्रतिस्पर्धा बढ़ती जा रही है।
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