निम्नलिखित के आशय स्पष्ट कीजिए-
फूल के ऊपर जो रेणु उसका श्रृंगार बनती है, वही धूल शिशु के मुँह पर उसकी सहज पार्थिवता को निखार देती है।
लेखक सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ‘धूल’ पाठ की प्रस्तुत पंक्ति में धूल की महिमा पर बल देते हैं। वे शिशु खासकर ग्रामीण परिवेश में पले-बढे शिशु के मुख पर स्वाभाविक रुप से छा गये धूल की तुलना किसी फूल के उपर छा गये धूल से करते हैं। उनका इस प्रकार से कहना वास्तव में हमारे सामने शिशु के उपर छाये धूल को उसकी सुंदरता बढाने वाले किसी सौंदर्य प्रसाधन के समान माना गया है। यह धूल फूल के उपर छाकर वास्तव में उस फूल का श्रृंगार बनती है और ग्रामीण शिशु के मुख पर यह धूल छाकर उसका सहज पार्थिव या कहिये मिट्टी का आवरण बनकर उसका श्रृंगार करती है।
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