निम्नलिखित के आशय स्पष्ट कीजिएः
जैसे वायु की लहरें कटी हुई पतंग को सहसा भूमि पर नहीं गिर जाने देतीं उसी तरह खास परिस्थितियों में हमारी पोशाक हमें झुक सकने से रोके रहती है।
लेखक यशपाल ने प्रस्तुत पाठ में पतंग की तुलना हमसे की है। उन्होंने वायु की तुलना हमारी पोशाक से की है। इस संदर्भ में लेखक समाज द्वारा हमारी प्रतिष्ठा को हमारे द्वारा पहने गये पोशाक से आंकता पाता है। इस संदर्भ में लेखक का साफ मानना है कि जिस प्रकार वायु अथवा हवा का झोंका कटी हुई पतंग को एकबारगी गिरने नहीं देता है और उसे आकाश में थोड़ी देर के लिए ही सही पर थाम लेता है। ठीक उसी प्रकार हमारे द्वारा पहनी गयी पोशाक समाज में परिस्थितियों वश गिरी हमारी प्रतिष्ठा को एकबारगी गिरने नहीं देते बल्कि प्रतिष्ठा में परिस्थिति वश आये हनन को लोगों की नजरों से बचा ले जाती हैं। थोङी देर के लिए ही सही पर पोशाक समाज में हमारे मान-सम्मान को परिस्थितियों के आगे झुके रहने से रोके रखती है।
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