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आपकी दृष्टि में कन्या के साथ दान की बात करना कहाँ तक उचित है?

कन्या के साथ दान कि बात करना बिलकुल भी उचित नहीं है| कन्यादान एक सामाजिक कुरीति है जिसने स्त्री की दशा को दयनीय बनाने में अहम भूमिका निभाई है| इस जैसी कुरीतियों के कारण स्त्री एक वस्तु बनकर रह गयी है जो कभी परिवार तो कभी समाज के अत्याचारों को झेलती रही है | यह प्रथा सदियों से चली आ रही है| रामायण से लेकर महाभारत हर जगह स्त्री कि दयनीय दशा का वर्णन मिलता है | कन्यादान प्रथा ने समाज को अभिशापित कर दिया है एवं कन्या का जीवन दूभर कर दिया है| जहाँ एक तरफ कन्या को पूजा जाता है वही दूसरी तरफ कन्यादान के नाम पर उसका किसी वस्तु कि भाती मोल भाव किया जाता है और सही मोल ना मिलने पर उसे आग में झोंक दिया जाता है| हमें इस प्रथा को बदलने की और बेटी को भी समान अधिकार देने की आवश्यकता है ताकि कन्यादान किसी भी कन्या के लिए अभिशाप न बने |


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8

यहाँ अफगानी कवयित्री मीना किश्वर कमाल की कविता की कुछ पंक्तियाँ दी जा रही हैं| क्या आपको कन्यादान कविता से इसका कोई संबंध दिखाई देता है?

मैं लौटूँगी नहीं


मैं एक जगी हुई स्त्री हूँ


मैंने अपनी राह देख ली है


अब मैं लौटूँगी नहीं


मैंने ज्ञान के बंद दरवाजे खोल दिए हैं


सोने के गहने तोड़कर फेंक दिए हैं


भाइयों! मैं अब वह नहीं हूँ जो पहले थी


मैं एक जगी हुई स्त्री हूँ


मैंने अपनी राह देख ली है


अब मैं लौटूँगी नहीं