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यहाँ अफगानी कवयित्री मीना किश्वर कमाल की कविता की कुछ पंक्तियाँ दी जा रही हैं| क्या आपको कन्यादान कविता से इसका कोई संबंध दिखाई देता है?

मैं लौटूँगी नहीं


मैं एक जगी हुई स्त्री हूँ


मैंने अपनी राह देख ली है


अब मैं लौटूँगी नहीं


मैंने ज्ञान के बंद दरवाजे खोल दिए हैं


सोने के गहने तोड़कर फेंक दिए हैं


भाइयों! मैं अब वह नहीं हूँ जो पहले थी


मैं एक जगी हुई स्त्री हूँ


मैंने अपनी राह देख ली है


अब मैं लौटूँगी नहीं

दोनों ही कविताएँ स्त्री को केंद्र में रखकर लिखी गयी है| दोनों ही कविताओं में स्त्री को जागरूक एवं सजक बताया गया है| इस कविता की पात्र जागने की बात कह रही है अर्थात् उसे अपनी आज़ादी का मोल समझ आ गया है| उसने अपने लिए ज्ञान के दरवाजे खोल लिए है वह ज्ञान का महत्व समझ गयी है| उसने अपने गहने त्याग दिए है जो उसे बंधन का आभास करा रहे थे| उसे अपनी राह पता है वह किसी पर निर्भर नहीं है| वह अब पहले की तरह कमज़ोर और लाचार नहीं है| उसने सभी कुप्रथाओं को तोडकर घर से बाहर कदम रखना सीख लिया है| इस कविता में स्त्री का क्रोध और विचारो में दृढ़ता नज़र आ रही है|


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