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टोपी और इफ्फ़न की दादी अलग-अलग मजहब और जाति के थे पर एक अनजान रिश्ते से बँधे थे। इस कथन के आलोक मे विचार लिखिए।

प्रेम आत्मा और विचारों के मिलन का नाम है। प्रेम मजहब और जााति से ऊपर की वस्तु है। यह इन बातो का पाबंद नही होता। जो व्यक्ति प्रेम के सागर में गोते लगाता है, वह रहन- सहन, खान- पान, रीति- रिवाज और सामाजिक हैसियत का घ्यान नहीं रखता। लेखक ने बताया है कि टोपी कट्टर हिंदू परिवार से संबंध रखता था। लेकिन वह अपने परिवार से आत्मीय संबंध नहीं बना सका। उसे अपने परिवार से कभी भी भरपूर प्यार नहीं मिल सका। इस कारण कई बार घर में लड़ाई का वातावरण बन जाता था। तथा इफ़्फ़न की दादी मुसलमान थीं किंतु फिर भी टोपी और इफ्फन की दादी में एक अटूट मानवीय रिश्ता था। टोपी को दादी का प्यार अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। उसके घर वालों के मना करने और पीटने पर भी वह इफ्फ़न के घर जाने की जि़द पर अड़ा रहता है। दोनों आपस में स्नेह के बंधन में बंधे थे। टोपी को इफ्फ़न के घर में अपनापन मिलता था। दादी के आँचल की छाँव में बैठकर वह स्नेह का अपार भंडार पाता था। इसके लिए रीति-रिवाज़, सामाजिक हैसियत, खान-पान आदि कोई महत्व नहीं रखता था। इफ्फन की दादी भी घर में अकेली थीं, उनकी भावनाओं को समझने वाला भी कोई न था। अतः दोनों का रिश्ता धर्म और जाति की सीमाएँ पार कर प्रेम के बंधन में बँध गया। दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे थे। लेखक ने हमें समझाया है कि जब दिल से दिल मिल जाते हैं तो मज़हब और जाति के बंधन बेमानी हो जाते हैं। अतः स्पष्ट हो जाता है कि टोपी व इफ्फ़न की दादी अलग-अलग मज़हब और जाति के होने पर भी वे दोनों आपस में प्रेम व स्नेह की अदृश्य डोर से बँधे हुए थे।


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