भाव स्पष्ट कीजीए-
(क) कोटिक ए कलधौत के धाम करील के कुंजन ऊपर वारौं।
(ख) माइ री वा मुख की मुसकानि सम्हारी न जैहै, न जैहे, न जैहे।
इस पंक्ति में कवि ने ब्रज की कांटेदार झाड़ियों के लिए सौ महलों को न्योछावर करने की बात कही है। उनके अनुसार अगर उन्हें मौका मिले तो वह अपना जीवन श्री कृष्ण के लिए न्योछावर कर दे। ये महल तो बहुत तुच्छ चीज़ है उनके लिए। कवि जीवन पर्यन्त ब्रज के वन-उपवन, तालाब और बगीचे के सौंदर्य को निहारना चाहते है। श्री कृष्ण भगवान गायों को चराने के लिए जो लाठी और कम्बल प्रयोग में लाते थे उसके पाने के लिए कवि तीनो लोकों का राज भी त्यागने को तैयार है। ब्रजभूमि के कण-कण में श्री कृष्ण भगवान विद्मान है। इसलिए कवि अपने भगवान को पाने के लिए आठों सिद्धि और नवों निधि के सुख को भी भुलाने के लिए तैयार है।
(ख) इस पंक्ति में कवि ने यह भाव व्यक्त किया है कि श्री कृष्ण जब अपनी मुरली बजाते थे तो उनकी मुरली की ध्वनि सुनकर पूरा ब्रजगाओं उनके वश में हो जाता था। उन की बांसुरी की ध्वनि अत्यंत मधुर थी लेकिन गोपियाँ श्री कृष्ण को यह जाताना नहीं चाहती थी की वे सब उनके वश में हो गयी है। इसलिए गोपियाँ श्री कृष्ण जी की मधुर ध्वनि न सुन पाए उसके लिए वे अपने कानों में उँगलियाँ लगा लेती हैं। लेकिन सारे ब्रजवासी गोपियों से कहते है कि जैसे ही तुम्हे श्री कृष्ण कि मधुर ध्वनि सुनाई देगी वैसे ही तुम सब की मुख की मुस्कान संभाले नहीं सम्भलेगी। तब श्री कृष्ण को तुरंत पता चल जायेगा की तुम उसकी बांसुरी सुनकर अत्यंत प्रसन्न हो गयी हो। ब्रजभूमि की गाये भी श्री कृष्ण की बांसुरी की मधुर ध्वनि में मग्न होकर अटारी में चढ़कर गाने लगती थी।
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