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पेड़ के भीतर फव्वारा नहीं होता, तब पेड़ की जड़ों से पत्ते तक पानी कैसे पहँुचता है? इस क्रिया को वनस्पति-शास्त्र में क्या कहते हैं? क्या इस क्रिया को जानने के लिए कोई आसान प्रयोग है? जानकारी प्राप्त कीजिए।

यह तो सत्य है कि पेङ के भीतर फव्वारा नहीं होता और फिर भी जङ से अवशोषित होने के बाद जल पत्तियों पर पहुंच जाता है। यह कोई जादू का कार्य नहीं है। प्रकृति ने पेङ की संरचना ही इस प्रकार से की है कि यह क्रिया यहां पर हमें देखने को मिलती है। ऐसा पेङों के तने में उपस्थित जायलेम कोशिकाओं के द्वारा संभव हो पाता है। ये जायलेम कोशिकाएं जङों द्वारा अवशोषित जल को अपनी ओर उपर की तरफ खींचता है। फिर यह जल और उपर यानि पत्तियों की ओर फेंका जाता है। इस क्रिया को वनस्पतिशास्त्र में ‘कोशिका क्रिया’ कहते हैं।


प्रयोग- हम रंगीन पानी भरे एक बीकर में श्वेत पुष्प वाले पौधे को डालते हैं। थोड़ी देर बाद हम पाते हैं कि श्वेत पुष्प पर रंगीन धारियां पङ गयी हैं। वास्तव में पौधे के जङों से रंगीन जल अवशोषित होकर पत्तियों के उपर तक पहुंच गया। पौधे के तना में उपस्थित जायलेम कोशिका की कोशिका क्रिया द्वारा ही ऐसा संभव हो पाया।


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पानी की कहानी’ पाठ में ओस की बूँद अपनी कहानी स्वयं सुना रही है और लेखक केवल श्रोता है। इस आत्मकथात्मक शैली में आप भी किसी वस्तु का चुनाव करके कहानी लिखें।

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समुद्र के तट पर बसे नगरों में अधिक ठंड और अधिक गरमी क्यों नहीं पड़ती?

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पानी की कहानी’ में लेखक ने कल्पना और वैज्ञानिक तथ्य का आधार लेकर ओस की बूँद की यात्रा का वर्णन किया है। ओस की बूँद अनेक अवस्थाओं में सूर्यमंडल, पृथ्वी, वायु, समुद्र, ज्वालामुखी, बादल, नदी और जल से होते हुए पेड़ के पत्ते तक की यात्रा करती हैं। इस कहानी की भाँति आप भी लोहे अथवा प्लास्टिक की कहानी लिखने का प्रयास कीजिए।

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अन्य पदार्थों के समान जल की भी तीन अवस्थाएँ होती हैं। इन्य पदार्थों से जल की इन अवस्थाओं में एक विशेष अंतर यह होता है जल की तरल अवस्था की तुलना में ठोस वर्फ हल्की होती है। इसका कारण ज्ञात कीजिए।