‘पानी की कहानी’ में लेखक ने कल्पना और वैज्ञानिक तथ्य का आधार लेकर ओस की बूँद की यात्रा का वर्णन किया है। ओस की बूँद अनेक अवस्थाओं में सूर्यमंडल, पृथ्वी, वायु, समुद्र, ज्वालामुखी, बादल, नदी और जल से होते हुए पेड़ के पत्ते तक की यात्रा करती हैं। इस कहानी की भाँति आप भी लोहे अथवा प्लास्टिक की कहानी लिखने का प्रयास कीजिए।
आज मैं अपने घर के मेन गेट में लगे लोहे के दरवाजे की कहानी उसी की जुबानी सुना रहा हूं। तो सुनिये। मैं पहले लौह अयस्क के रुप में था। इस प्रकार मैं कच्ची अवस्था मे था। वहां से मैं कारखाने में लाया गया । कारखाने में मुझे पिघला कर सांचे में ढाला गया। इस प्रकार मैंने एक आकार ग्रहण किया। इस आकार को और आगे पीट-पीटकर चौरस कर दिया गया। फिर मुझे आपकी आज्ञानुसार एक निश्चित डिजाइन में ढालकर दरवाजे की शक्ल दे दी गयी| फिर नट-वोल्ट से कसकर कस दिया गया| इसे पेंट इत्यादि कर खूबसूरत बनाकर आपके घर की सुरक्षा के साथ-साथ शोभा सुंदरता बढाने हेतु आपके घर की चारदीवारी में उपयुक्त स्थान पर फिट कर दिया गया। आज मैं आपके यहां एक निर्जीव पर भरोसेमंद द्वारपाल की भूमिका निभा रहा हूं।
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