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इस पाठ में अंतरक्षि यान अजनबी बनकर आता है। ‘अजनबी’ शब्द पर सोचो। इंसान भी कई बार अजनबी माना जाता है और कोई जगह या शहर भी। क्या तुम्हारी मुलाकात ऐसे किसी अजनबी से हुई है? नए स्कूल का पहला अनुभव कैसा था? क्या उसे भी अजनबी कहोगे? अगर हाँ तो ‘अजनबीपन’ दूर कैसे हुआ? इस पर सोचकर कुछ लिखो।

‘अजनबी’ कुछ भी हो सकता है फिर चाहे स्कूल के पहले दिन में अनजान लोगों से मिलना हो या फिर ऑफिस का पहला दिन। आप उन लोगों के बारे में कुछ भी जानते नहीं हो, कभी मिले नहीं हो, स्वभाव कैसा होगा ऐसी अनेक बातें मन में तैर रही होती है। हालांकि कुछ वक्त बिताने के बाद अजनबीपन दूर होने लगता है। कुछ महीनों बाद तो ऐसा लगने लगता है कि कभी अजनबी थे ही नहीं।


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नंबर एक, नंबर दो और नंबर तीन अजनबी से निपटने के कौन-से तरीके सुझाते हैं और क्यों?

1

(क) दिलीप एम साल्वी

(ख) जयंत विष्णु नार्लीकर


(ग) आइजक ऐसीमोव


(घ) आर्थर क्लार्क


ऊपर दिए गए लेखकों की अंतरिक्ष-संबंधी कहानियाँ इकट्ठी करके पढ़ो और एक-दूसरे को सुनाओ। इन कहानियों में कल्पना क्या है और सच क्या है, इसे समझने की कोशिश करो। कुछ ऐसी कहानियाँ छाँटकर निकालो, जो आगे चलकर सच साबित हुई हैं।


1

यह कहानी जमीन के अंदर की जिदंगी का पता देती है। जमीन के ऊपर मंगल ग्रह पर सब कुछ कैसा होगा, इसकी कल्पना करो और लिखो।

2

मान लो कि तुम छोटू हो और यह कहानी किसी को सुना रहे हो तो कैसे सुनाओगे? सोचो और ‘मैं’ शैली (आत्मकथात्मक शैली) में यह कहानी सुनाओ।