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मान लो कि तुम मोहन की तबीयत पूछने जाते हो? तुम अपने और मोहन के बीच की बातचीत को संवाद के रूप में लिखो।

मैं- मोहन कैसे हो, सुना तुम्हारे पेट में दर्द है?

मोहन- हां सुबह से ऐसे-ऐसे हो रहा है।


मैं- ऐसे-ऐसे मतलब कैसे? ये तो मैं पहली बार सुन रहा हूं।


मोहन- बस ऐसे-ऐसे हो रहा है?


मैं- अच्छा, कल से तो स्कूल खुल रह हैं? तुम कैसे आओगे फिर?


मोहन- जब ऐसे-ऐसे होना बंद हो जाएगा, तब आऊँगा।


मैं- तुम्हारे बिना तो क्लास में रौनक ही नहीं रहेगी।


मोहन- क्या करूं, तबीयत ठीक होती तो जरूर आता।


मैं- ठीक है, दवा खाओ और जल्दी ठीक होने की कोशिश करो।


मोहन- हाँ, ठीक है।


मैं- अब मैं चलता हूँ। कल स्कूल जाते समय फिर एक बार आऊँगा। अगर पेट ठीक हो जाए तो तुम भी तैयार रहना।


मोहन- अच्छा भाई, ठीक है।


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1

स्कूल के काम से बचने के लिए मोहन ने कई बार पेट में ‘ऐसे-ऐसे’ होने के बहाने गनाए। मान लो, एक बार एसे सचमुच पेट में दर्द हो गया और उसकी बातों पर लोगों ने विश्वास नहीं किया, तब मोहन पर क्या बीती होगी?

2

पाठ में आए वाक्य-‘लोचा-लोचा फिर है’ के बदले ‘ढीला-ढाला हो गया है’ या ‘बहुत कमजोर हो गया है’ लिखा जा सकता है। लेकिन लेखक ने संवाद में विशेषता लाने के लिए बोलियों के रंग-ढंग का उपयोग किया है। इस पाठ में इस तरह की अन्य पंक्तियाँ भी हैं, जैसे-

- इत्ती नयी-नयी बीमारियाँ निकली हैं,


- राम मारी बीमारियों ने तंग कर दिया,


- तेरे पेट में तो बहुत बड़ी दाढ़ी है।


अनुमान लगाओ, इन पंक्तियों को दूसरे ढंग से कैसे लिखा जा सकता है?


4

संकट के समय के लिए कौन-कौन से नंबर याद रखे जाने चाहिए? ऐसे वक्त में पुलिस, फ़ायर ब्रिगेड और डॉक्टर से तुम कैसे बात करोगे? कक्षा में करके बताओ।

1

मास्टर- स्कूल का काम तो पूरा कर लिया है?

(मोहन ‘हाँ’ में सिर हिलाता है।)


मोहन- जी, सब काम पूरा कर लिया है।


इस स्थिति में नाटक का अंत क्या होता? लिखो।