द्रुपद और द्रोणाचार्य भी सहपाठी थे। उनकी मित्रता और शत्रुता की कथा महाभारत से खोजकर सुदामा के कथानक से तुलना कीजिए।
श्रीकृष्ण और सुदामा बचपन में एक साथ शिक्षा ग्रहण करते थे। बचपन में दोनों की घनिष्ठ मित्रता के किस्से जग जाहिर थे। ठीक इसी तरह द्रुपद और द्रोण भी महर्षि भारद्वाज के आश्रम में पढ़ाई किया करते थे। द्रुपद के पिता राजा थे, तो वहीं द्रोण के दूर-दूर तक चर्चे थे। दोनों की मित्रता भी श्रीकृष्ण सुदामा जैसी ही थी। द्रुपद बचपन में द्रोण से कहते थे कि जब मैं राजा बनूंगा तो आधा राज्य तुम्हारे नाम कर दूंगा। हालांकि जैसे-जैसे समय बीता द्रोण और गरीब होता चला गया और द्रुपद की जिंदगी राजा जैसी हो गई। एक बार जब द्रोण उससे सहायता मांगने गए तो द्रुपद ने उसे अपनी मित्रता के लायक भी न समझा और उन्हें अपमानित करके भगा दिया। इसके बाद द्रोण ने पांडवों तथा कौरवों को धनुविद्या सिखानी शुरू की। फिर अर्जुन से गुरु-दक्षिणा में द्रुपद को बंदी बनाकर लाने को कहा। अर्जुन ने ऐसा ही किया। द्रोण ने उनके द्वारा किए गए अपमान की याद दिलाते हुए द्रुपद को मुक्त तो कर दिया|
सुदामा के कथानक से तुलना- कृष्ण और सुदामा की मित्रता जहाँ सच्चे अर्थों में आदर्श थी, वहीं द्रोण तथा द्रुपद की मित्रता एकदम ही इसके विपरीत थी।
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