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गवरइया के स्वभाव से यह प्रमाणित होता है कि कार्य की सफलता के लिए उत्साह आवश्यक है। सफलता के लिए उत्साह की आवश्यकता क्यों पड़ती है, तर्क सहित लिखिए।

किसी भी बस्तु को पाने के लिए उस बस्तु की चाह अथवा उत्साह का होना जरूरी है। गवरइया के मन में बस एक बार ही टोपी पहनने का ख्याल आया था। उसने सोच लिया था कि चाहे जो भी हो जाए वो टोपी तो पहनकर रहेगी। तभी घूरे पर चुगते हुए रुई का फाहा भी मिल गया। उसने सोचकर एक कदम बढ़ा दिया था। अगली मंजिल उसे अपने आप मिलती चली गई। गवरइया में टोपी पहनने का उत्साह था। वो गवरे के कहने पर नीरस नहीं हुई। उसने अपनी इच्छा को जगाए रखा। धुनिये, कोरी, बुनकर और दर्जी ने काम करने से ना भी किया लेकिन गवरइया ने उन्हें अच्छा प्रस्ताव देकर मना लिया। आखिरकार वो एक टोपी की मालकिन बन गई।


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किसी कारीगर से बातचीत कीजिए और परिश्रम का उचित मूल्य नहीं मिलने पर उसकी प्रतिक्रिया क्या होगी- ज्ञात कीजिए और लिखिए।

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गवरइया की इच्छा-पूर्ति का क्रम घूरे पर रूई के मिल जाने से प्रारंभ होता है। उसके बाद वह क्रमशः एक-एक करके कई कारीगरों के पास जाती है और उसकी टोपी तैयार होती है। आप भी अपनी कोई इच्छा चुन लीजिए। उसकी पूर्ति के लिए योजना और कार्य विवरण तैयार कीजिए।

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टोपी पहनकर गवरइया राजा को दिखाने क्यों पहुँची जबकि उसकी बहस गवरा से हुई और वह गवरा के मुँह से अपनी बड़ाई सुन चुकी थी। लेकिन राजा से उसकी कोई बहस हुई ही नहीं थी। फिर भी वह राजा को चुनौती देने को पहुँची। कारण का अनुमान लगाइए।

2

यदि राजा के राज्य के सभी कारीगर अपने-अपने श्रम का उचित मूल्य प्राप्त कर रहे होते तब गवरइया के साथ उन कारीगरों का व्यवहार कैसा होता?