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टोपी पहनकर गवरइया राजा को दिखाने क्यों पहुँची जबकि उसकी बहस गवरा से हुई और वह गवरा के मुँह से अपनी बड़ाई सुन चुकी थी। लेकिन राजा से उसकी कोई बहस हुई ही नहीं थी। फिर भी वह राजा को चुनौती देने को पहुँची। कारण का अनुमान लगाइए।

जब गवरइया रुई का फाहा लेकर कोरी के पास गई तो उसने उसे राजा का काम करने का हवाला दिया। जब वो सूत कतवाने गई तो भी उसे पता चला कि कोरी राजा का कोई काम कर रहा है। इसी तरह बुनकर और दर्जी ने भी पहले राजा का काम करने की बात कही। गवरइया ये सुनकर हैरान थी कि हर कोई सिर्फ राजा का ही काम कर रहा है। इसके बावजूद गवरइया ने अपनी समझदारी से टोपी हासिल कर ली। तब उसके मन में ख्याल आया कि जब हर कोई राजा का काम कर रहा है तो उससे भी जरा मिल आना चाहिए। टोपी पहनने के बाद गवरइया के अंदर एक अलग आत्मविश्वास था। उसने नामुमकिन चीज को मुमकिन कर दिखाया था। इसी वजह से जब वह राजा के पास पहुंची तो उसने देखा कि राजा के सिर पर तो टोपी ही नहीं है। इससे उसका आत्मविश्वास और बढ़ गया और उसने राजा को भी चुनौती दे दी। गवरइया की चुनौती से तो राजा के भी तोते उड़ गए थे।


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गवरइया की इच्छा-पूर्ति का क्रम घूरे पर रूई के मिल जाने से प्रारंभ होता है। उसके बाद वह क्रमशः एक-एक करके कई कारीगरों के पास जाती है और उसकी टोपी तैयार होती है। आप भी अपनी कोई इच्छा चुन लीजिए। उसकी पूर्ति के लिए योजना और कार्य विवरण तैयार कीजिए।

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गवरइया के स्वभाव से यह प्रमाणित होता है कि कार्य की सफलता के लिए उत्साह आवश्यक है। सफलता के लिए उत्साह की आवश्यकता क्यों पड़ती है, तर्क सहित लिखिए।

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यदि राजा के राज्य के सभी कारीगर अपने-अपने श्रम का उचित मूल्य प्राप्त कर रहे होते तब गवरइया के साथ उन कारीगरों का व्यवहार कैसा होता?

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चारों कारीगर राजा के लिए काम कर रहे थे। एक रजाई बना रहा था। दूसरा अचकन के लिए सूत कात रहा था। तीसरा धागा बुन रहा था। चौथा राजा की सातवीं रानी की दसवीं संतान के लिए झबले सिल रहा था। उन चारों ने राजा का काम रोककर गवरइया का काम क्यों किया?