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यदि राजा के राज्य के सभी कारीगर अपने-अपने श्रम का उचित मूल्य प्राप्त कर रहे होते तब गवरइया के साथ उन कारीगरों का व्यवहार कैसा होता?

गवरइया अपना रुई का फाहा लेकर एक-एक कर धुनिये, कोरी, बुनकर और दर्जी के पास गई। सभी ने उससे कहा कि वो राजा का काम कर रहे हैं इसलिए उसका काम नहीं करेंगे। वहीं जब गवरइया ने उन्हें उचित मूल्य देने की बात कही तो वो राजा का काम छोड़कर उसकी टोपी बनाने में लग गए। राजा अपने किसी कारीगर को उचित मूल्य नहीं दे रहा था। अगर वो सही पैसे देता तो कारीगर पहले राजा का काम करते। राजा का काम पूरा होने तक गवरइया को इंतजार करना पड़ता।


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गवरइया के स्वभाव से यह प्रमाणित होता है कि कार्य की सफलता के लिए उत्साह आवश्यक है। सफलता के लिए उत्साह की आवश्यकता क्यों पड़ती है, तर्क सहित लिखिए।

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टोपी पहनकर गवरइया राजा को दिखाने क्यों पहुँची जबकि उसकी बहस गवरा से हुई और वह गवरा के मुँह से अपनी बड़ाई सुन चुकी थी। लेकिन राजा से उसकी कोई बहस हुई ही नहीं थी। फिर भी वह राजा को चुनौती देने को पहुँची। कारण का अनुमान लगाइए।

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चारों कारीगर राजा के लिए काम कर रहे थे। एक रजाई बना रहा था। दूसरा अचकन के लिए सूत कात रहा था। तीसरा धागा बुन रहा था। चौथा राजा की सातवीं रानी की दसवीं संतान के लिए झबले सिल रहा था। उन चारों ने राजा का काम रोककर गवरइया का काम क्यों किया?

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गाँव की बोली में कई शब्दों का उच्चारण अलग होता है। उनकी वर्तनी भी बदल जाती है। जैसे गवरइया ‘गौरैया’ का ग्रामीण उच्चारण है। उच्चारण के अनुसार इस शब्द की वर्तनी लिखी गई है।

फुँदना, ‘फुलगेंदा’ का बदला हुआ रूप है। कहानी में अनेक शब्द हैं जो ग्रामीण उच्चारण में लिखे गए हैं, जैसे- मुलुक-मुल्क, खमा-क्षमा, मजूरी- मजदूरी, मल्लार-मल्हार इत्यादि। आप क्षेत्रीय या गाँव की बोली में उपयोग होने वाले कुछ ऐसे शब्दों को खोजिए और उनका मूल रूप लिखिए, जैसे- टेम-टाइम, टेसन/टिसन-स्टेशन।