नवाब साहब ने बहुत ही यत्न से खीरा काटा, नमक-मिर्च बुरका, अंततः सूँघकर ही खिड़की से बाहर फेंक दिया। उन्होंने ऐसा क्यों किया होगा? उनका ऐसा करना उनके कैसे स्वभाव को इंगित करता है?
नवाब साहब अपनी नवाबी शान-शौकत को दिखाने की आदत रखते थे। वे अपनी हरकत से ठाट-बाट का प्रदर्शन करने में लगे थे। अचानक ही नवाब साहब ने लेखक को सम्बोधित करते हुए खीरे का लुत्फ़ उठाने को कहा परंतु लेखक ने शुक्रिया करते हुए मना कर दिया। नवाब ने बहुत ढंग से खीरे को धोकर छीला, काटा और उसमे जीरा, नमक-मिर्च बुरककर तौलिये पर सजाते हुए फिर वापस लेखक को खाने के लिए कहा किंतु एक बार मना कर चुके थे इसलिए आत्मसम्मान बनाए रखने के लिए दूसरी बार पेट खराब होने का बहाना बताया। लेखक ने मन ही मन सोचा कि साहब रईस बनते हैं लेकिन लोगों की नजर से बच सकने के ख्याल में अपनी असलियत पर बन आए हैं। नवाब साहब खीरे की एक फाँक को उठाकर होंठों तक ले गए, सूँघा और मुंह में आये पानी का घूँट गले से उतर गया तब नवाब साहब ने फाँक को खिड़की से बाहर छोड़ दिया। इस प्रकार यह सब नवाब साहब के अमीरी दिखावे का स्वभाव, दंभ, अंहकार, गर्व, अभिमान, दर्प, घमंड आदि की ओर संकेत करता है।
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