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खीरे के संबंध में नवाब साहब के व्यवहार को उनकी सनक कहा जा सकता है। आपने नवाबों की और भी सनकों और शौक के बारे में पढ़ा-सुना होगा। किसी एक के बारे में लिखिए।

एक बार लखनऊ के एक नवाब मसनद के सहारे बैठकर शतरंज खेल रहे थे। तभी उन्हें खबर मिली की अंग्रेजों की सेना ने आक्रमण कर दिया है, सब तहस महस हो रहा है। बार बार उनको यह बताया जा रहा था। परंतु इसके बारे में चिंतित होने और इसे रोकने के बजाए नवाब साहब ने अपने अर्दली को आवाज लगाई ताकि वह आकर उन्हें जूते पहना दे। लेकिन अर्दली तो अपनी जान बचाकर भाग चुका था। फिर क्या था, नवाब साहब वहीं बैठे रहे। एक नवाब भला अपने हाथों से जूते कैसे पहन सकता था। अंग्रेजों के सैनिक आये और नवाब साहब को पकड़कर ले गए। यह यही दर्शाता है कि नवाबों में अकड थी क्योंकि वो राजशौंक से रहते थे परंतु अपनी प्रजा का ध्यान और प्रजा को सुरक्षित रखना भी उनकी जिम्मेदारी थी।


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नवाब साहब द्वारा खीरा खाने की तैयारी करने का एक चित्र प्रस्तुत किया गया है। इस पूरी प्रक्रिया को अपने शब्दों में व्यक्त कीजिए।

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किन-किन चीजों का रसास्वादन करने के लिए आप किस प्रकार की तैयार करते हैं?

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क्या सनक का कोई सकारात्मक रूप हो सकता है? यदि हाँ तो ऐसी सनकों का उल्लेख कीजिए।

8

निम्नलिखित वाक्यों में से क्रियापद छाँटकर क्रिया-भेद भी लिखिए-

(क) एक सप़फ़ेदपोश सज्जन बहुत सुविधा से पालथी मारे बैठे थे।


(ख) नवाब साहब ने संगति के लिए उत्साह नहीं दिखाया।


(ग) खाली बैठे, कल्पना करते रहने की पुरानी आदत है।


(घ) अकेले सफर का वक्त काटने के लिए ही खीरे खरीदे होंगे।


(ड़) दोनों खीरों के सिर काटे और उन्हें गोदकर झाग निकाला।


(च) नवाब साहब ने सतृष्ण आँखों से नमक-मिर्च के संयोग से चमकती खीरे की फाँकों की ओर देखा।


(छ) रवाब साहब खीरे की तैयारी और इस्तेमाल से थककर लेट गए।


(ज) जेब से चाकू निकाला।