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निम्नलिखित का भाव स्पष्ट कीजिये-

दे प्रकाश का सिंधु अपरिमित,


तेरे जीवन का अणु गल गल!

कवयित्री यहां हमसे हमारे जीवन के संपूर्ण अस्तित्व की अहंकार रूपी एक-एक इकाई को ईश्वर से एकाकार होने हेतु गलाने का आह्वान करती हैं। जिस प्रकार कि कोई विद्यार्थी अपनी आने वाली परीक्षा में सफल होने के लिए अपना शरीर परिश्रम से गला डालता है और उसकी यह मेहनत प्रकाश के बङे पुंज की तरह बाहर आकर उसे फल प्रदान करती है। यहां भी कवयित्री के कहने का भाव ठीक वैसा ही है। कवयित्री कहती हैं कि हम अपने जीवन के अस्तित्व के एक-एक अणु को गलाकर अपने आप में समुद्र के समान अपार प्रकाश उत्पन्न करें जो कि ईश्वर का मार्ग आलोकित करे और हम उनमें एकाकार हो पायें।


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निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-

नीचे दी गई काव्य-पंक्तियों को पढ़िए और प्रश्नों के उत्तर दीजिए-


जलते नभ में देख असंख्यक,


स्नेहहीन नित कितने दीपक;


जलमय सागर का उर जलता,


विद्युत ले घिरता है बादल!


विहँस-विहँस मेरे दीपक जल!


(क) ‘स्नेहहीन दीपक’ से क्या तात्पर्य है?


(ख) सागर को ‘जलमय’ कहने का क्या अभिप्राय है और उसका हृदय क्यों जलता है?


(ग) बादलों की क्या विशेषता बताई गई है?


(घ) कवयित्री दीपक को ‘विहँस-विहँस’ जलने के लिए क्यों कह रही हैं?

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निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-

क्या मीराबाई और आधुनिक मीरा ‘महादेवी वर्मा’ इन दोनों ने अपने-अपने आराध्य देव से मिलने के लिए जो युक्तियाँ अपनाई हैं, उनमें आपको कुछ समानता या अंतर प्रतीत होता है? अपने विचार प्रकट कीजिए।

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निम्नलिखित का भाव स्पष्ट कीजिये-

युग-युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल,


प्रियतम का पथ आलोकित कर!

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निम्नलिखित का भाव स्पष्ट कीजिये-

मृदुल मोम-सा घुल रे मृदु तन!