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प्रेमचंद के फटे जूते को आधार बनाकर परसाई जी ने यह व्यंग्य लिखा है। आप भी किसी व्यक्ति की पोशाक को आधार बनाकर एक व्यंग्य लिखिए।

मेरे ननिहाल में एक व्यक्ति को मैं उनके पहनावे को लेकर आज भी याद करता हूँ। वे अपने घर पर काफी साधारण पोशाक में रहते थे। वे अपना सर तो सदा मुंडाये रखते थे। उनके शरीर का उपरी भाग प्रायः बिना किसी आवरण के रहता था। अपने शरीर को ढंकने के लिए लुंगी वह एकमात्र स्थायी वस्त्र के रुप में पहनते थे। वह लुंगी भी प्रायः गंदी और अस्त-व्यस्त ही रहती थी। घर से बाहर किसी काम से निकलने पर वह अपने कंधे पर लकङी की झाङी डाल लेते थे। सबसे अजीब बात थी कि गांव के लोग उनपर हँसने से पहले उस व्यक्ति के ऐसा करने के बारे में नहीं सोचते थे। वास्तव में वह व्यक्ति काफी साधन संपन्न व्यक्ति था। गांव के कुछ बुरी प्रवृत्ति वाले लोगों द्वारा उसके मेधावी होने पर भी नौकरी न मिलने पर उसके अवसादग्रस्त होने पर नशे की आदत लगा दी गयी थी। इस अवस्था में आकर उसे अपने तन-मन की सुध ना रही। और वह मेधावी युवक इस प्रकार हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था और उसमें समाहित भ्रष्टाचार पर चोट करता हुआ लोगों की हँसी का ताउम्र पात्र बनता रहा।


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