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मेरी रीढ़ में एक झुरझुरी-सी दौड़ गई’- लेखक के इस कथन के पीछे कौन-सी घटना जुड़ी है?

त्रिपुरा के हिंसाग्रस्त मुख्य मार्ग में प्रवेश करने से पहले लेखक टीलियामुरा गया। राष्ट्रीय राजमार्ग - 44 पर अगले 83 किलोमीटर यानि मनु तक की यात्रा के दौरान ट्रैफिक सी.आर.पी.एफ की सुरक्षा में काफिलों की शक्ल में चलता है। मुख्य सचिव और आई.जी., सी. आर.पी.एफ से मैंने निवेदन किया था कि वे हमें घेरेबंदी में चलने वाले काफिले के आगे - आगे चलने दे। थोड़ी ना-नुकुर के बाद वे इसके लिए तैयार हो गए लेकिन उन्होंने शर्त रखी कि मुझे और मेरे कैमरामैन को सी.आर.पी.एफ की हथियारबंद गाडी में चलना होगा और हमें शूटिंग अपने जोखिम पर करनी होगी। लेखक अपनी शूटिंग में इतना व्यस्त था कि उसे वहां पर कोई डर महसूस ही नहीं हुआ। फिर जब उनको सुरक्षा प्रदान कर रहे सी.आर.पी.एफ के एक जवान ने पहाड़ियों पर रखे दो पत्थरों की तरफ उनका ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि दो दिन पहले उनका एक जवान यहाँ विद्रोहियों द्वारा मार डाला गया था, यह सुनकर लेखक की रीढ़ में एक झुरझुरी - सी दौड़ गयी और शेष यात्रा में वह यह ख्याल अपने दिल से नहीं निकाल पाया कि हमें घेरे हुए शांतिपूर्ण दिखाई देने वाले जंगलों में बन्दूक लिए विद्रोही भी छिपे हो सकते है।


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