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आशय स्पष्ट कीजिए-

() ‘फटा सुर न बख्शें। लुंगिया का क्या है, आज फटी है, तो कल सी जाएगी।’


(ख) ‘मरे मालिक सुर बख्श दे। सुर में वह तासीर पैदा कर कि आँखों से सच्चे मोती की तरह अनगढ़ आँसू निकल आएँ।’

() बिस्मिल्ला खाँ अपनी कला को ही महत्वपूर्ण मानते थे। आशय है कि खुदा सुर को अच्छा बनाए रखे। यदि सुर बिगड़ गया, फट गया तो सब कुछ चला गया क्योंकि उस्ताद जानते थे उनकी पहचान, उनका सम्मान सुर शहनाई ही है और इसीलिए उन्हें फटी लुंगी पहनने से मना किए जाने पर वे कहते हैं कि भगवान उन्हें फटा हुआ सुर न दें। लूंगी आज फटी है तो कल वह सिल भी सकती है परंतु यदि सुर बिगड़ गया तो संभलेगा नहीं| इस प्रकार बिस्मिल्ला खाँ जी खुदा से सुर को बनाए रखने की प्रार्थना करते हैं।

(ख) बिस्मिल्ला खाँ जी पाँचों वक़्त की नमाज पढ़ते थे। बिस्मिल्ला खाँ जी नमाज के बाद सजदे करते हैं कि खुदा उनके सुर को इतना प्रभावशाली, सच्चा, मार्मिक, सुमधुर बना दे कि जिसे सुनकर श्रोताओं की आँखों से भावनाओं के आँसू सच्चे मोती की तरह स्वाभाविक रूप से बह निकलें। उस सुर में मन को करूणापूर्ण कर देने वाली शक्ति हो। हृदय से उनके सुर की प्रशंसा में उद्गार निकल पड़े।


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