मुहर्रम से बिस्मिल्ला खाँ के के जुड़ाव को अपने शब्दों में लिखिए।
बिस्मिल्ला खाँ अपने धर्म के प्रति संपूर्ण समर्पित थे। अपने मजहब की परंपराओं के प्रति शालीन और सजग थे। अपने नियम के अनुसार वे सच्चे मुसलमान की तरह पाँचों वक्त की नमाज अदा करते थे। मुहर्रम पर्व के साथ बिस्मिल्ला खाँ और शहनाई का सबंध बहुत गहरा है। मुहर्रम के महीने में शिया मुसलमान शोक मनाते जिसमें शिया मुसलमान हजरत इमाम हुसैन और उनके वंशजों के प्रति अजादारी मानते हैं। इन दिनों कोई राग-रागिनी नहीं बजाई जाती थी। इसलिए पूरे दस दिनों तक उनके खानदान का कोई व्यक्ति न तो मुहर्रम के दिनों में शहनाई बजाता था और न ही संगीत के किसी कार्यक्रम में भाग लेते थे। आठवीं तारीख उनके लिए खास महत्व की होती थी। आठवें दिन खाँ साहब खड़े होकर शहनाई बजाते और दालमंड़ी में फातमान के करीब आठ किलोमीटर की दूरी तक पैदल रोते हुए, नौहा बजाते हुए जाते थे। उनकी आँखें इमाम हुसैन और उनके परिवार के लोगों की शहादत में नम रहती थीं।
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