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मुहर्रम से बिस्मिल्ला खाँ के के जुड़ाव को अपने शब्दों में लिखिए।

बिस्मिल्ला खाँ अपने धर्म के प्रति संपूर्ण समर्पित थे। अपने मजहब की परंपराओं के प्रति शालीन और सजग थे। अपने नियम के अनुसार वे सच्चे मुसलमान की तरह पाँचों वक्त की नमाज अदा करते थे मुहर्रम पर्व के साथ बिस्मिल्ला खाँ और शहनाई का सबंध बहुत गहरा है। मुहर्रम के महीने में शिया मुसलमान शोक मनाते जिसमें शिया मुसलमान हजरत इमाम हुसैन और उनके वंशजों के प्रति अजादारी मानते हैं। इन दिनों कोई राग-रागिनी नहीं बजाई जाती थी। इसलिए पूरे दस दिनों तक उनके खानदान का कोई व्यक्ति न तो मुहर्रम के दिनों में शहनाई बजाता था और न ही संगीत के किसी कार्यक्रम में भाग लेते थे। आठवीं तारीख उनके लिए खास महत्व की होती थी। आठवें दिन खाँ साहब खड़े होकर शहनाई बजाते और दालमंड़ी में फातमान के करीब आठ किलोमीटर की दूरी तक पैदल रोते हुए, नौहा बजाते हुए जाते थे। उनकी आँखें इमाम हुसैन और उनके परिवार के लोगों की शहादत में नम रहती थीं।


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बिस्मिल्ला खाँ के जीवन से जुड़ी उन घटनाओं और व्यक्तियों का उल्लेख करें जिन्होंने उनकी संगीत साधना को समृद्ध किया?

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बिस्मिल्ला खाँ के व्यक्तित्व की कौन-कौन सी विशेषताओं ने आपको प्रभावित किया?

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बिस्मिल्ला खाँ कला के अनन्य उपासक थे, तर्क सहित उत्तर दीजिए।

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निम्नलिखित मिश्र वाक्यों के उपवाक्य छाँटकर भेद भी लिखिए-

(क) यह जरूर है कि शहनाई और डुमराँव एक-दूसरे के लिए उपयोगी हैं।


(ख) रीड अंदर से पोली होती है जिसके सहारे शहनाई को फूँका जाता है।


(ग) रीड नरकट से बनाई जाती है जो डुमराँव में मुख्यतः सोन नदी के किनारों पर पाई जाती है।


(घ) उनको यकीन है, कभी खुदा यूँ हीह उन पर मेहरबान होगा।


(ड़) हिरन अपनी ही महक से परेशान पूरे जंगल में उस वरदान को खोजता है जिसकी गमक उसी में समाई है।


(च) खाँ साहब की सबसे बड़ी देन हमें यही है कि पूरे अस्सी बरस उन्होंने संगीत को संपूर्णता व एकाधिकार से सीखने की जिजीविषा को अपने भीतर जिंदा रखा।