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माधवदास क्यों बार-बार चिडि़या से कहता है कि यह बगीचा तुम्हारा ही है? क्या माधवदास निःस्वार्थ मन से ऐसा कह रहा था? स्पष्ट कीजिए।

माधवदास बार-बार चिड़िया से कह रहे थे कि वो इसे अपना ही बगीचा समझे। वो अपने सूने बगीचे में चिड़िया को देख बहुत खुश थे। माधवदास चिड़िया के जरिए अपने अकेलेपन को दूर करना चाहते थे। चिड़िया से बात करके उन्हें खुशी मिलती थी| इसलिए उन्होंने चिड़िया से कहा कि वो इस बगीचे में रहे और जहां चाहे घूमे। इससे उसका भी मन लगा रहेगा लेकिन माधवदास ने चिड़िया से ये सब स्वार्थ के चलते कहा था। क्योंकि माधवदास अकेला था। उससे बात करने वाला, सुख-दुख बांटने वाला कोई नहीं था। इतनी संपदा होते हुए भी उसका मन सूना था। अत: वह चिड़िया को अपने पास रोककर खुद खुश रहने का बहाना ढूंढ रहा था। अतः माधवदास ने चिड़िया से यह बात निःस्वार्थ भाव से नहीं कही थी ऐसा कहने में उसका स्वार्थ था|


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1

किन बातों से ज्ञात होता है कि माधवदास का जीवन संपन्नता से भरा था और किन बातों से ज्ञात होता है कि वह सुखी नहीं था?

3

माधवदास के बार-बार समझाने पर भी चिडि़या सोने के पिंजरे और सुख-सुविधाओं को कोई महत्व नहीं दे रही थी। दूसरी तरफ़ माधवदास की नजर में चिडि़या की जिद का कोई तुक न था। माधवदास और चिडि़या के मनोभावों के अंतर क्या-क्या थे? अपने शब्दों में लिखिए।

4

कहानी के अंत में नन्ही चिडि़या का सेठ के नौकर के पंजे से भाग निकलने की बात पढ़कर तुम्हें कैसा लगा? चालीस-पचास या इससे कुछ अधिक शब्दों में अपनी प्रतिक्रिया लिखिए।

5

माँ मेरी बाट देखती होगी’ नन्ही चिडि़या बार-बार इसी बात को कहती है। आप अपने अनुभव के आधार पर बताइए कि हमारी जिंदगी में माँ का क्या महत्त्व है?