माधवदास के बार-बार समझाने पर भी चिडि़या सोने के पिंजरे और सुख-सुविधाओं को कोई महत्व नहीं दे रही थी। दूसरी तरफ़ माधवदास की नजर में चिडि़या की जिद का कोई तुक न था। माधवदास और चिडि़या के मनोभावों के अंतर क्या-क्या थे? अपने शब्दों में लिखिए।
माधवदास बार-बार चिड़िया से कह रहा था कि वो यहीं रुक जाए। वो उसे सोने का पिंजड़ा बनवाकर देगा। वो सोने, चांदी, हीरे, मोती से उसे लाद देगा। लेकिन चिड़िया के लिए इन कीमती चीजों का कोई मूल्य नहीं था। उसे बस अपनी आजादी, मां, भाई, धूप, छाँव, सूरज की रोशनी आदि से प्यार था| वो तो बस जरा हवा खाने उस बगीचे में जा पहुंची थी। उसे तो ये भी नहीं पता था कि साहूकार क्या होता है। उसके लिए इन सोने, चांदी और महल का कोई मतलब नहीं था।
चिड़िया ने माधवदास से कहा कि वह तो अपनी मां, भाई, सूरज, धूप, घास, पानी और फूलों से प्यार करती है। उसे जल्दी घर जाना है क्योंकि उसकी मां राह देख रही होगी। अंधेरा हो गया तो वो राह भूल जाएगी। चिड़िया के बार-बार इस तरह बोलने पर भी माधवदास को उसकी भावनाओं की कोई कद्र नहीं थी। वो हर बार उससे यही कहता कि अभी अंधेरा कहां हुआ है। अभी तो उजेला है, तुम चली जाना। साथ ही वो चिड़िया को कई प्रलोभन भी दे रहा था जिससे चिड़िया उसके पास रुक जाए। माधवदास ऐसा स्वार्थ के वशीभूत होकर कर रहा था
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