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सरकारी तंत्र में जॉर्ज पंचम की नाक लगाने को लेकर जो चिंता या बदहवासी दिखाई देती है वह उनकी किस मानसिकता को दर्शाती है।

प्रस्तुत कहानी कथाकार कमलेश्वर की कलम से लिखी गयी है। हम देशवासियों के मन में देशभक्ति की भावना जगाने के उद्देश्य से यह कहानी लिखी गई है। सरकारी तंत्र में जार्ज पंचम की नाक लगाने को लेकर जो चिंता या बदहवासी दिखाई देती है वह हम भारतीयों की अंग्रेजों से आजादी मिलने के बाद भी हमारी अब तक गुलामी की मानसिकता से मुक्ति ना मिल पाने की सरकारी तंत्र के माध्यम से हमारी मनोदशा को दर्शाता है। हमारी यह बुरी दशा वर्षों से गुलामी में जकड़े रहने के कारण हो गयी है। अपनी स्वतंत्रता छिन जाने पर व्यक्ति कठपुतली के समान हो जाता है जिसकी डोर उसके स्वामी के हाथों में रहती है। इस स्थिति में व्यक्ति की अपनी बुद्धि काम नहीं करती और वह स्वामी की चाटुकारिता पर उतर आता है। यही हाल हमारे सरकारी तंत्र का गुलामी की लम्बी अवधि में हुआ है। गुलामी की मानसिकता उनपर इतनी हावी है कि हमारे देश को स्वतंत्रता मिलने के काफी वर्षों बाद भी हमारे सरकारी तंत्र जार्ज पंचम की नाक लगाने को तत्पर हैं या यों कहें उसके स्वागत में कोई कसर नहीं छोङ रहे हैं। इस तरह से सरकारी तंत्र अपनी अयोग्यता, अदूरदर्शिता, मूर्खता और चाटुकारिता या जी हुजुरी को प्रदर्शित कर अपनी हीन भावना या कहें कि अपनी गुलामी की मानसिकता को दर्शाता है।


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