उद्धव ज्ञानी थे, नीति की बातें जानते थे; गोपियों के पास ऐसी कौन-सी शक्ति थी जो उनके वाक्चातुर्य में मुखरित हो उठी?
उद्धव ज्ञानी थे, परन्तु शायद व्यवहारिक ज्ञान उनके पास उतना नहीं था जितना कि गोपियों के पास था। उद्धव प्रेम की ताकत को भी नहीं जानते थे।
उद्धव प्रेम से पूर्णतः अनभिज्ञ थे। जबकि गोपियों के पास श्री कृष्ण से सच्चे प्रेम की शक्ति एवम भक्ति की भी शक्ति थी, जिस कारण उन्होंने उद्धव जैसे ज्ञानी और नीतिज्ञ व्यक्ति को भी अपनी वाक्चातुर्य से परास्त कर दिया। सूरदास जी ने गोपियों के माध्यम से कहा है कि-
"प्रीति नदी मैं पाउँ न बोरयौ, दृष्टि न रूप परागी।
‘सूरदास’ अबला हम भोरी, गुर चाँटी ज्यौं पागी।"
अर्थात ऊधव तो प्रेम की नदी के पास होकर भी उसमें डुबकी नहीं लगाते हैं और उनका मन पराग को देखकर भी मोहित नहीं होता है। हम गोपियाँ तो अबला और भोली हैं। हम कृष्ण के प्रेम में इस तरह से लिपट गये हैं जैसे गुड़ में चींटियाँ लिपट जाती हैं।
इसके अलावा गोपियों के पास श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम, असीम लगाव और समर्पण की शक्ति थी। वे अपने प्रेम के प्रति दृढ़ विश्वास रखती थीं। यह सब उनके वाक्चातुर्च में मुखरित हो उठा।
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