‘बदलू को किसी बात से चिढ़ थी तो काँच की चूडि़यों से’ और बदलू स्वयं कहता है- ‘‘जो सुंदरता काँच की चूडि़यों में होती है, लाख में कहाँ संभव है?’’ ये पंक्तियाँ बदलू की दो प्रकार की मनोदशाओं को सामने लाती हैं। दूसरी पंक्ति में उसके मन की पीड़ा है। उसमें व्यंग्य भी है। हारे हुए मन से, या दुखी मन से अथवा व्यंग्य में बोले गये वाक्यों के अर्थ सामान्य नहीं होते।
कुछ व्यंग्य वाक्यों के अर्थ सामान्य नहीं होते। कुछ व्यंग्य वाक्यों को ध्यानपूर्वक समझकर एकत्र कीजिए और उनके भीतरी अर्थ की व्याख्या करके लिखिए।
पाठ से लिए गए कुछ व्यंग्य-वाक्यः
(क) बदलू को किसी बात से चिढ़ थी तो काँच की चूडि़यों से।
इस वाक्य से बदलू की दोहरी मनोदशा के बारे में पता चलता है। इसमें चूड़ियों को मशीनी युग की देन बताया है, जिसकी वजह कई कारीगरों का रोजगार छिन गया और वे बेरोजगार हो
गए। इसलिए यह चूड़ियां मन ही मन बदलू का देख पहुंचा रही हैं।
(ख) जो सुंदरता काँच की चूडि़यों में होती है, लाख की चूडि़यों में कहाँ संभव है?
इस वाक्य में बदलू ने बनावटी सुंदरता पर तंज कसा है। वह कांच से बनी चूड़ियों के प्रति लोगों के आकर्षण को देखते हुए मन ही मन दर्द से तड़प रहा है।
(ग) शहर की बात और है, लला। वहाँ तो सभी कुछ होता है।
इसमें उन्होंने शहरों की संस्कृति पर व्यंग्य किया है। यहां उन्होंने पश्चिमी सभ्यता को अपनाने वाले लोगों पर तंज कसा है और गांव की श्रेष्ठता को उजागर करने का प्रयास किया है, चाहे उन्हें कितना भी पिछड़ा क्यों न समझा जाता हो।
(घ) नाज़ुक तो फिर होता ही है लला !
इस वाक्य में बदलू ने शहर के उन लोगों पर तंज कसा है जो मजबूती और हाथ से बनी चीजों को छोड़कर सुंदर दिखने वाली कमजोर चीजों के पीछे दौड़ रहे हैं।
(ड़) कहा, जाओ शहर से ले आओ।
इस वाक्य में बदलू का दृढ़ व्यक्तित्व झलकता है। वह कम दाम पाने पर ज़मींदार जैसे व्यक्ति का प्रतिरोधा कर सकता है, किंतु दबाव में आकर झुकता नहीं है।
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