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(क) शब्द और पद में उदाहरण सहित अंतर स्पष्ट कीजिए।

(ख) नीचे लिखे वाक्यों का निर्देशानुसार रचना के आधार पर वाक्य रूपांतरण कीजिए।


(i) वह आए तो तुम छिप जाना। (सरल वाक्य)


(ii) गौरव ने अक्षय से नेपाल चलने के लिए कहा (मिश्र वाक्य)


(iii) वह पढाई के साथ-साथ काम भी करता है (संयुक्त वाक्य)

(क) शब्द- वर्णों के मेल से बना स्वतंत्र सार्थक ध्वनि समूह शब्द कहलाता है।


पद- जब वही शब्द व्याकरणीय नियमों में बंधकर वाक्य में प्रयुक्त होता है तब वही शब्द ‘पद’ कहलाता है|


जैसे- लड़का, मैदान, खेलना आदि शब्द है।


अगर इन्हीं शब्दों को किसी वाक्य में प्रयोग किया जाएगा तो ये पद कहलायेंगे|


जैसे- लड़के मैदान में खेलते हैं इस वाक्य में प्रयुक्त शब्द पद हैं|


(ख)


(i) सरल उनके आने पर तुम छिप जाना।


(ii) मिश्र - गौरव ने अक्षय से कहा कि वह भी नेपाल चले|


(iii) संयुक्त - वह पढ़ता भी है और काम भी करता है।


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निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

संस्कृत में एक कहावत है कि दुर्जन दूसरों के राई के समान मामूली दोषों को पहाड़ के समान बड़ा बनाकर देखता है और अपने पहाड़ के समान बड़े पापों को देखते हुए भी नहीं देखता। सज्जन या महात्मा ठीक इससे विपरीत होते हैं। उनका ध्यान दूसरों की बजाय केवल अपने दोषों पर जाता है। अधिकांश व्यक्तियों में कोई न कोई बुराई अवश्य होती है। कोई भी बुराई न होने पर व्यक्ति देवता की कोटि में आ जाता है। मनुष्य को अपनी बुराईयों को दुर करने का प्रयत्न करना चाहिए, न कि दूसरों की कमियों को लेकर छींटाकाशी करने या टिप्पणी करने का। अपने मन की परख मन को पवित्र करने का सबसे उत्तम साधन है। आत्मनिरीक्षण आत्मा की उन्नति का सर्वश्रेष्ठ मार्ग है। महात्मा कबीर ने कहा है कि जब मैंने मन की पड़ताल की तो मुझे अपने जैसा बुरा कोई न मिला। महात्मा गाँधी ने कई बार स्पष्ट रूप से कहा था कि मैंने जीवन में हिमालय जैसी बड़ी भूल की है। अपनी भूलों को ध्यान देना या उन्हें स्वीकार करना आत्मबल का चिन्ह है। जो लोग दूसरों के सामने अपनी भूल नहीं मानते और न ही अपने को दोषी स्वीकार करते है, वे सबसे बड़े कायर है। जिनका अंतःकरण शीशे के समान उजला है, उसे झट अपनी भूल महसूस हो जाती है। मन तो दर्पण है। मन में पाप है तो जग में पाप दिखाई देता है। पवित्र आचरण वाले अपने मन को देखते हैं तो उन्हें लगता है कि अभी इसमें कोई कमी रह गई है। इसलिए वे अपने को बुरा कहते हैं। यही उनकी नम्रता व साधना है।


(1) दुर्जन व सज्जन व्यक्ति अपनी किस चारित्रिक विशेषता के कारण भिन्न कहलाते हैं?


(2) उन्नति का सर्वश्रेष्ठ मार्ग किसे व क्यों माना गया हैं?


(3) सबसे बड़ा कायर कौन है?


(4) सज्जन व्यक्तियों की नम्रता का परिचय किस प्रकार मिलता है?


(5) उपरोक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक लिखिए?

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निम्नलिखित काव्यांश को ध्यानपूर्वक पढकर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

जो नहीं हो सके पूर्ण काम मै उनको करता हूँ प्रणाम।


कुछ कुंठित औ कुछ लक्ष्य भ्रष्ठ जिनके अभिमंत्रित तीर हुए,


रण की समाप्ति से पहले जो वीर रिक्त तूणीर हुए उनको प्रणाम।


जो छोटी सी नैया लेकर उतरे करने को उदाधि – पार;


मन की मन में हो रही, स्वयं हो गए उसी में निराकार उनको प्रणाम।


जो उच्च शिखर की और बढे रह रह नव-नव उत्साह भरे।


पर कुछ ने ले ली हिम समाधि, कुछ असफल ही नीचे उतरे उनको प्रणाम।


कृतकृत्य नहीं जो हो पाए, प्रत्युत फाँसी पर गए झूल


कुछ ही दिन बीते है, फिर भी यह दुनिया जिनको गई भूल! उनको प्रणाम।


(1) कवि किनको प्रणाम करता है व क्यों?


(2) छोटी नैया से कवि का आशय है और उनका क्या हश्र हुआ?


(3) कृतकृत्य कौन नहीं हो पाए? दुनिया ने उनके साथ क्या व्यवहार किया।

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(क) निम्मलिखित शब्दों का सामासिक पद बनाकर समास के भेद का नाम भी लिखिए।

कला में कुशल, जितना संभव हो


(ख) निम्नलिखित समस्त पदों का समास विग्रह करके समास के भेद का नाम लिखिए।


संसार, सागर, सतसई

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(क) निम्नलिखित वाक्यों को शुद्ध करके लिखिए

1. मुझे एक दूध का गरम गिलास दीजिए


2. सारे देश के नागरिक कर्तव्य निष्ठ है


3. रोगी मोहन को काटकर सेब खिलाओ


4. शहीदों का देश सदा आभारी रहेगा।


(ख) 1. रिक्त स्थान की पूर्ति उचित मुहावरों द्वारा कीजिए।


जब तक मनुष्य पर जिम्मेदारी नहीं आती तब तक उसे -----------पता नहीं चलता।


2. एक ही राग अलापना- मुहावरे का अर्थ लिखकर वाक्य में प्रयुक्त कीजिए