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निर्देशानुसार उत्तर लिखिए-

) जो अध्यापिका हिंदी पढ़ाती हैं, वे मेरी माँ हैं।


(आश्रित उपवाक्य छाँटकर उसका भेद लिखिए)


) मैं अस्वस्थ था इसलिए परीक्षा नहीं दे सका।


(सरल वाक्य में बदलिए)


) परिश्रम करने से लोग जीवन में सफल होते हैं।


(संयुक्त वाक्य में बदलिए)

) आश्रित उपवाक्य वे मेरी माँ हैं।


) मैं अस्वस्थता के कारण परीक्षा नहीं दे सका|


) जो परिश्रम करते हैं, वो जीवन में सफल होते हैं।


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निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर प्रत्येक लगभग 20 शब्दों में लिखिए-

जिसके जीवन में जितने अधिक दुख होते हैं वह उतना ही सबल होकर सुख की यात्रा पर निकलता है, क्योंकि दुख विपरीत स्थितियों से जूझने की क्षमता का विकास कर हमारी ऊर्जा को जगाते हैं। कभी-कभी मौसम में बड़ी विषमता दिखाई देती है। गर्मियों में वर्षा हो जाती है और शीतल वायु मौसम को सुहावना बना देती है। कई बार बरसात के मौसम में बादलों का नामोनिशान तक नहीं रहता। कभी सर्दी के मौसम में ठंड और कोहरे से निज़ात मिल जाती है। मौसम की यह प्रतिकूल हमारे अहित में नहीं होती। यही बात मनुष्य के जीवन में सुख-दुख के संबंध में उतनी ही सटीक है। व्यक्ति तथा समाज दोनों के विकास के लिए परस्पर विरोधी भावों का होना अनिवार्य है। ग्रीष्म हो या वर्षा, पदझड़ हो या वसंत, वे एक दूसरे के विरोधी नहीं अपितु पूरक हैं। एक के अभाव में दुसरे में आनंद कहाँ ? सुख की अनुभूति के लिए दुख की अनुभूति होनी आवश्यक है। इसके द्वारा हमारे अंदर की ऊर्जा जागती है। दुखों से कोई भाग नहीं सकता, उनसे जूझना ही पड़ता है। पहिये की तालियों की भाँति सुख-दुख ऊपर-नीचे होते हैं। जीवन भी एक चक्र ही है और चक्र टिकता नहीं, गतिशील रहता है।


) मनुष्य दुखों का सामना करने से सबल कैसे बन जाता है?


) लेखक ने मौसम की विषमता का उदाहरण क्यों दिया है?


) सुख की अनुभूति के लिए क्या आवश्यक है? क्यों?


) पहिये का उल्लेख क्यों किया गया है?


) उपर्युक्त गद्यांश के लिए उपयुक्त शीर्षक दीजिए।

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निम्नलिखित काव्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर प्रत्येक लगभग 20 शब्दों में लिखिए-

निर्मम कुम्हार की थापी से कितने रूपों में कुटी-पुटी


हर बार बिखेरी गई किंतु मिट्टी फिर भी तो नहीं मिटी।


आशा में निश्छल पल जाए, छलना में पड़कर छल जाए


सूरज दमके तो तप जाए, रजनी ठुमके तो ढल जाए


यों तो बच्चों की गुड़िया-सी, भोली मिट्टी की हस्ती क्या


आँधी आए तो उड़ जाए, पानी बरसे तो गल जाए।


फ़सलें उगतीं, फ़सलें कटती लेकिन धरती अविनश्वर है।


मिट्टी की महिमा मिटने में मिट-मिट हर बार सँवरती है।


मिट्टी मिट्टी पर मिटती है, मिट्टी मिट्टी को रचती है।


क) ‘भोली मिट्टी की हस्ती क्या’ कवि ने ऐसा क्यों कहा है?


ख) वे कौन सी परिस्थितियाँ हैं, जो मिट्टी के स्वरूप को मिटाने में असफल रहती हैं ?


ग) सूरज के दमकने पर मिट्टी पर क्या प्रभाव पड़ता है?


घ) धरती के सदा उर्वर रहने का क्या प्रमाण है?


ङ) मिटाने का प्रयास करने पर भी धरती कैसी रहती है?

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निर्देशानुसार वाच्य परिवर्तित कीजिए-

क) चलो, घूमने चलते हैं। (वाच्य का भेद लिखिए)


ख) क्या आपके द्वारा पूरी कहानी पढ़ ली गई। (कर्तवाच्य में)


ग) फादर रिश्ते बनाकर तोड़ते नहीं थे। (कर्मवाच्य में)


घ) मैं इस पेड़ पर नहीं चढ़ सकता। (भाववाच्य में)

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रेखांकित पदो का पद-परिचय लिखिए-

आजकल देश प्रगति के मार्ग पर बढ़ रहा है।