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निम्नलिखित में से किसी के विषय पर दिए गए संकेत बिन्दुओं के आधार पर लगभग 200 से 250 शब्दों में निबन्ध लिखिए-

(3) अपने लिए जिए, तो क्या जिए


प्रस्तावना


मनुष्य में बढ़ती स्वार्थपरता


परोपकार की प्रकृति और पूर्वजों की सीख


मानव जीवन की सार्थकता


उपसंहार

प्रस्तावना— अपने लिए जिए, तो क्या जिए। इस वाक्य का अर्थ है निस्वार्थ भाव से लोगों की सेवा करना। इसी को परोपकार भी कहा जाता है। जब हम बिना अपने बारे में सोचे किसी के लिए कुछ अच्छा करते हैं तो वो परोपकार की श्रेणी में आ जाता है। परोपकार का सबसे अच्छा उदाहरण है प्रकृत्ति। प्रकृत्ति के कण—कण में परोपकार की भावना व्याप्त है। जैसे धरती, समुद्र, वृक्ष, आकाश और नदियां मानव जाति को कुछ ना कुछ दे रहे हैं। इसके बदले में उन्हें कुछ चाहिए नहीं होता।


मनुष्य में बढ़ती स्वार्थपरता— मनुष्य में बढ़ती स्वार्थपरता— सभी सांसारिक जीवों में इसलिए श्रेष्ठ माना जाता है क्यों कि उसमें परोपकार की भावना होती है। लेकिन आज लोगों में ये भावना समाप्त होती जा रही है। मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए दूसरों को ही नहीं बल्कि प्रकृत्ति को भी नुकसान पहुंचाने से नहीं चूकता है। लोगों में स्वार्थ आने का सबसे बड़ा कारण है लालच। लालच के चलते मनुष्य दूसरे का जीवन लेने से भी नहीं सोचते। इसीलिए मनुष्य आज दुखी रहता है। परोपकार व्यक्ति को दूसरों के आशीर्वाद तथा शुभ संदेश अनायास ही प्राप्त होते हैं जिससे जीवन में सुख, समृद्वि, चेतना तथा स्फूर्ति का संचार होता है। परोपकारी का परिचय क्षेत्र बढ़ता है। उसे समाज में यश, आदर, सम्मान, प्रतिष्ठा मिलती है।


परोपकार की प्रकृति और पूर्वजों की सीख— हमारे पूर्वजों ने स्वार्थ से परे रह परोपकार करना सिखाया है। बचपन से हमने ईमानदारी के कई पाठ पढ़े हैं। परोपकारी व्यक्ति में सदाचारी आदि गुण अनायास ही आ जाते हैं। वह इतिहास-पुरुष बन जाता है। परोपकार की भावना हमें प्रकृति से मिली है। प्रकृति के चांद, सूरज, नदियां,वृक्ष सभी तो परोपकार के प्रतीक है। परोपकार मानव के लिए भी सबसे बड़ा धर्म है। परोपकार के कारण ही हम स्वार्थ जैसी तुच्छ भावना से दूर रहते हैं। परोपकार करने से हमारी हानि नहीं बल्कि हमें लाभ ही होता है।


मानव जीवन की सार्थकता— इस सृष्टि का सर्व—श्रेष्ठ प्राणी मनुष्य ही है। मनुष्य में बुद्धि होती है जो उसे अच्छे और बुरे की समझ देती है। मानव का जीवन तभी सार्थक हो सकता है जब वह स्वार्थ छोड़ दूसरों का परोपकार करे। ऐसी लम्बी आयु जीने का क्या फायदा यदि वह उत्तम कार्यो के लिए उपयोग में नहीं लाई जा सकती। हमारे जीवन और समाज की बहुत सी समस्याओं का समाधान इंसानियत से हो सकता है। मानवीय व्यवहार से हो सकता है। एक मात्र मानव जीवन ही वह अवसर है, जिसमें हम जो भी चाहें प्राप्त कर सकते हैं। हमारा मुख्य उद्देष्य होना चाहिए कि मानव कल्याण के लिए जो भी श्रेष्ठ हो, पूर्णता प्राप्त का प्रयास करें। ऐसा न करके हमारा जीवन निष्फल और अर्थहीन होगा। ऐसे जीवन में कोई गुणवत्ता नहीं होगी।


उपसंहार— मनुष्य जीवन एक मधुर और अमूल्य ईष्वरीय देन है, जिसके साथ कोई खिलवाड़ नहीं किया जाना चाहिए। केवल दिखावे के लिए अपने जीवन को दांव पर न लगाए। साथ ही दूसरों का बुरा करने से भी बचे। स्वार्थ मनुष्य के जीवन को खोखला बना देता है। भगवान सबसे बड़ा परोपकारी है जिसने हमारे कल्याण के लिये संसार का निर्माण किया। प्रकृति का प्रत्येक अंश परोपकार की शिक्षा देता प्रतीत होता है। मानव अपने और अपनों के चक्कर में उलझ कर स्वार्थी हो गया है। उसकी उन्नति रुक गयी है। वहीं अगर हम परोपकार करने से यश बढ़ता है। दुआयें मिलती हैं। सम्मान प्राप्त होता है।


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