‘आत्मत्राण’ कविता अन्य प्रार्थनाओं से किस प्रकार अलग है?
अथवा
कबीर के दोहों की प्रासंगिकता स्पष्ट कीजिए|
इस धरती पर प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन के संघर्षों से छुटकारा पाना चाहता है परंतु इस कविता में कवि किसी भी प्रकार की सहायता की इच्छा नहीं करता हैं। उसकी
प्रार्थना केवल इतनी है कि ईश्वर उसे निडर, स्वस्थ एवं अविजित बनाए| वह ईश्वर को दु:ख की हर घडी में भी याद करता है परंतु सुख में याद नहीं करता लेकिन आत्मत्राण कविता में कवि ने अलग ही बात की है| वह सदैव आत्मविश्वास, धैर्य, शक्ति, हिम्मत बनाए रखने व निर्भय होकर जीवन की मुसीबतों पर विजय प्राप्त कर जीने की प्रार्थना करते है|
अथवा
कबीर पंद्रहवीं शताब्दी के संत थे। भक्तिकाल के कवियों मे वह प्रमुख रहस्यवादी कवि थे| उनके दोहे सुनने वाले लिख लेते थे या कंठस्ठ कर लेते थे क्योंकि कबीर अनपढ़ थे, पर ज्ञान के भंडार से भरे हुए थे। कबीर दास जी कहते हैं कि मनुष्य जीवन तो अनमोल है इसलिए हमें अपने मानव जीवन को भोग-विलास में व्यतीत नहीं करना चाहिए बल्कि हमें अपने अच्छे कर्मों के द्वारा अपने जीवन को उद्देश्यमय बनाना चाहिए। उन्होंने हिंदू और मुसलमानों के बीच मानवता का सेतु बांधा। जो आजीवन समाज और लोगों के बीच व्याप्त आडंबरों पर कुठाराघात करते रहे। वे एक ही ईश्वर को मानते थे और कर्मकाँडों के घोर विरोधी थे। सच्चे अर्थों में कबीर उस दौर के सबसे बड़े समाज सुधारक थे क्योंकि उन्होंने उस दौर में व्याप्त हर एक सामाजिक कुरीति पर कड़ा प्रहार किया है साथ ही उनके उपदेश वर्तमान में भी प्रासंगिक हैं|
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