सेनानी न होते हुए भी चश्मेवाले को लोग कैप्टन क्यों कहते थे?
प्रस्तुत पाठ लेखक स्वयंप्रकाश की रचना ‘नेताजी का चश्मा’ से लिया गया है। इस पाठ के अन्तर्गत हम पाते हैं कि सेनानी न होते हुए भी चश्मेवाले को लोग कैप्टन कहते थे। इसका कारण उसके रंग-रूप में देशप्रेम की भावना का भरा होना था। हालांकि वह शरीर से दिव्यांग था यानि उसके पैर कुछ हद तक लाचार थे और उसके पास संसाधनों का भी अभाव था। ऐसा होने के बावजूद भी उसमें देशभक्ति की भावना अपने पूर्ण रूप में मौजूद थी। ऐसा उसके क्रियाकलापों से प्रदर्शित होता है। वह एक फेरीवाला था जिसके पास बेचने हेतु तरह-तरह के चश्मे थे और वह अपनी पसंद के चश्मे को नेता जी सुभाषचंद्र बोस की मूर्ति पर लगाता था। कोई उपाय नहीं बचने पर वह मूर्ति की आंखों पर फिर दूसरा चश्मा लगा देता था। वह नेताजी की मूर्ति को कभी खाली नहीं छोङता था। ऐसा उसने जीवनपर्यंत किया। कहने का अर्थ है उसने नेताजी की मूर्ति की आंखों के उपर हमेशा चश्मा लगाये रखा। इस तरह चश्मावाले को सेनानी ना होते हुए भी उसके दिल में देशभक्ति की भावना के कारण लोग उसे कैप्टन कहते थे।
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