आशय स्पष्ट कीजिए-
‘‘बार-बार सोचते, क्या होगा उस कौम का जो अपने देश की खातिर घर-गृहस्थी-जवानी-जिंदगी सब कुछ होम देने वालों पर भी हँसती है और पने लिए बिकने के मौके ढूंढ़ती है।’’
उक्त उद्धरण लेखक स्वयंप्रकाश की रचना ‘नेताजी का चश्मा’ से ली गई है। लेखक उक्त उक्ति इनकी इस रचना के एक पात्र हालदार साहब के मुंह से कहलवाते हैं। हालदार साहब का इस बारे में बार-बार सोचना है कि भारत में कई लोग ऐसे हुए हैं जिन्होंने अपने देश की स्वतंत्रता की खातिर अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया। हमारे देश के इन वीर सपूतों ने इस हेतु अपने जान की परवाह भी नहीं की। देश की स्वतंत्रता के लिए उनमें दीवानगी इस हद तक थी कि उन्होंने इस हेतु अपने निजी सुख को परे रखते हुए देश की आजादी को अपना एकमात्र लक्ष्य माना और इस हेतु काफी कष्ट सहे। हालदार साहब स्वतंत्र भारत में लोगों के मन में इन स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति सम्मान का अभाव देखते हैं। ये लोग स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग के बारे में जरा भी नहीं सोचते हैं उल्टे उनकी देशभक्ति की भावना को फालतू की चीज समझते हैं। यहां तक कि ये लोग कुछ पाने की खातिर अपने देश के मान-सम्मान की बलि चढानी हो तो ये उस हेतु भी तैयार रहते हैं। ये लोग इतने स्वार्थी हो गये हैं कि इनकी नजरों में भौतिक सुख की प्राप्ति के आगे इनका देश भी मायने नहीं रखता है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण वे कैप्टन की मृत्यु के बाद नेताजी की मूर्ति की बच्चों को छोड़कर किसी अन्य के द्वारा सुध नहीं लिये जाने पर भी सोचते हैं।
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