मैदान में सभा ने होने देने के लिए पुलिस बंदोबस्त का विवरण देते हुए सुभाष बाबू के जुलूस और उनके साथ पुलिस के व्यवहार की चर्चा कीजिए।
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बढ़ती आबादी के पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों की चर्चा करते हुए स्पष्ट कीजिए कि, ‘नेचर की सहनशक्ति की भी एक सीमा होती है।’
26 जनवरी, 1931 का दिन कलकत्तावासियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण था। इससे एक वर्ष पहले इसी दिन देश का स्वतंत्रता दिवस मानाया गया था| इस वर्ष इसकी पुनरावृत्ति थी जिसके लिए काफी तैयारियां पहले से की गई थी। लोगों ने अपने घरों मे राष्ट्रीय तिरंगा फहराया था। ऐसा मालूम होता था कि मानों स्वतंत्रता मिल गई हो। सुभाष बाबू के जुलूस का पूरा भार पूर्णोदय दास पर था जिन्होंने इस जुलूस का पूरा प्रबंध किया। उन्होंने हर जगह फोटो का भी प्रबंध किया लेकिन पुलिस द्वारा पकड़ लिया गया। इसके बाद स्त्रियों ने जुलूस को निकालने का जिम्मा लिया। धर्मतले के मोड़ पर करीब 50-60 महिलाओं ने धरना दिया। आखिरी में 105 स्त्रियां पकड़ी गईं। लालबाजार आने तक कई लोगों पर लाठियां बरसाई गई। इसमें कई लोग घायल भी हो गए। इस तरह वहां पर जाकर जुलूस समाप्त हो गया।
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बढ़ती आबादी का पर्यावरण पर सबसे ज्यादा कुप्रभाव पड़ा है। आबादी बढ़ी तो जाहिर सी बात है कि प्राकृतिक संसाधनों की खपत भी ज्यादा होगी| लोगों के पास रहने के लिए स्थान की कमी होती जा रही है जिससे वनों का आकार अपने आप छोटा होता जा रहा है। जल स्तर लगातार नीचे होता जा रहा है जिसकी वजह से पानी की किल्लत बढ़ती जा रही है। विकास के नाम पर पेड़ों का कटाव जारी है जो पर्यावरण को धीरे-धीरे असंतुलित कर रहा है। ऐसे में इतना तो कहा जा सकता है कि नेचर की भी सहनशक्ति की सीमा होती है और जब मनुष्य इस सीमा को पार कर जाते हैं तब नेचर इसे संतुलित करने के लिए प्रतिक्रिया करती है| जिसे हम विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं जैसे बाढ़, भूकंप आदि के रूप में देख सकते हैं|
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