‘स्कूल हमारे लिए ऐसी जगह न थी जहाँ खुशी से भागे जाएँ’ फिर भी लेखक और साथी स्कूल क्यों जाते थे? आज के स्कूलों के बारे में आपकी क्या राय है? क्यों ? विस्तार से समझाइए।
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हरिहर काका के विरोध में मंहत और पुजारी ही नहीं भाई भी थे। इसका कारण क्या था? हरिहर काका उनकी राय क्यों नहीं मानना चाहते थे। विस्तार से समझाइए।
स्कूल शिक्षा का वो मंदिर है जहां पर ज्ञान का भंडार है। इसकी वजह से लेखक और साथी स्कूल जाते थे। पहले की अपेक्षा अब स्कूलों में काफी बदलाव आ गया है। अब स्कूलों में मोटी फीस के साथ कई सारी सुविधाएं बच्चों को मिलती है। चकाचक स्कूल की बिल्डिंग और कलरफुल ड्रेस के अलावा बच्चों की पढ़ाई को भी हाईटेक किया गया है। इसके साथ ही स्कूलों में सांस्कृतिक कार्यक्रमों और खेल से संबंधित चीजों के लिए पहले से ज्यादा ध्यान दिया जाता है। यहां तक कि बच्चों को स्पोर्ट्स कोटा भी मिलने लगा है। इसके जरिए बच्चों को किसी भी अन्य स्कूल में दाखिला मिलने में आसानी होती है। साथ ही इसके अलग से भी कुछ नंबर होते हैं। यानी कि इतना जरूर कहा जा सकता है कि पहले की अपेक्षा अब शिक्षा प्रणाली में काफी बदलाव आया है।
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हरिहर काका के विरोध में महंत ही नहीं पुजारी भी थे। ऐसा इसलिए क्योंकि वह अपनी जमीन उन दोनों में से किसी के नाम नहीं कर रहे थे। महंत चाहता था कि हरिहर अपनी जमीन को ठाकुर जी के नाम कर दे। अगर वह ऐसा नहीं करेगा तो उसकी जमीन उसके भाई हथिया लेंगे। वहीं भाई चाहते थे कि हरिहर जीते जी अपनी जमीन अपने भतीजों के नाम कर दे। हरिहर काका दोनों ही बात मानने को तैयार नहीं थे। हरिहर काका ने जमीन जायदाद हाथ से चली जाने के बाद क्या होता है वह स्थिति बहुत करीब से देखी है। इस वजह से वह अपनी जायदाद जीते जी किसी के नाम नहीं करना चाहते थे।
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